कुंडौरी गांव में प्रवासी पक्षी..
यह नजारा बोकारो सेक्टर-9 के नजदीक कुंडौरी गांव का है। दरअसल झारखंड के छोटे-बड़े जलाशयों में 70 हजार से अधिक प्रवासी जलीय पक्षी (माइग्रेटरी वाटर बर्ड) तीन से चार महीने बिताते हैं। इनमें मंगोलिया, तिब्बत, लद्दाख, और चीन से आने वाले पक्षी (विंटर विजिटर) शामिल हैं। झारखंड में नवंबर-दिसंबर से इनका आना शुरू होता है और फरवरी-मार्च के बाद ये पक्षी यहां से वापस लौट जाते हैं।
बता दें की झारखंड आए पक्षियों में 12 थ्रीटेंड स्पीशीज (खतरे के स्तर तक पहुंचे) हैं। ये आंकड़ा एशियन वाटर बर्ड सेंसस-2016 (जलीय पक्षियों की गणना) का है। धनबाद का मैथन, कोडरमा का तिलैया डैम, चतरा का ईटखोरी डैम, जमशेदपुर का डिमना झील, धनबाद के मैथन डैम, तोपचांची झील व बोकारो के तेनुघाट समेत अन्य जलाशयों के आसपास का इलाका इन विदेशी मेहमान पक्षियों का बसेरा होता है।
प्रवासी पक्षियों के जानकारों का मानना है कि ये पक्षी अपनी पीढ़ी-दर-पीढ़ी झारखंड के विभिन्न जलाशयों को कुछ दिनों के लिए अपना बसेरा बनाते है। बिना किसी दिशा सूचक यंत्र के ये बुद्धिमान पक्षी हजारों किलोमीटर के आकाशीय रास्ते को तय कर यहां पहुंचते है। पक्षी कई दिन-रात उड़ कर यहां पहुंचते है और ठंड के महीने में जलाशयों के निकट भोजन तलाशते भी देखे जाते है।
प्रवासी पक्षी जहां डैम, झील और जलाशयों में आने वाले सैलानियों के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र होते है, वहीं कुछ लोग शरारती तत्वों द्वारा इन्हें अपना निशाना भी बनाने की कोशिश की जाती है। इसके रोकथाम के लिए भी आवश्यक पहल की जरुरत है,ताकि कुछ दिनों के लिए आने वाले प्रवासी पक्षियों को किसी प्रकार की कठिनाईयों का सामना नहीं करना पड़े।
(P.C : Pramod Kumar Mahto)
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